अनुकूलन (Adaptation) किसे कहते हैं? इनके प्रकार

अनुकूलन की परिभाषा (Adaptation Definition Hindi) -:

विभिन्न प्रकार के जीव जंतु अपने रहने के लिए अलग-अलग परिवेश और परिस्थितियों को अपनाकर उसमें रहने के लिए अनुकूलित हो जाते हैं तो इस प्रक्रिया को जीव जन्तुओ का अनुकूलन (Adaptation) कहा जाता है।

अनुकूलन में जीव जंतु प्रकृति द्वारा उपलब्ध परिवेश या पर्यावरण को अपनाकर, उस परिवेश के अनुसार खुद को ढाल कर उस परिस्थिति में रहते हैं। जीव जंतु प्रकृति द्वारा उपलब्ध होने वाले परिस्थिति को उसी के अनुकूल ढाल लेते हैं और उसमे अपने अस्तित्व को बनाए रखते हैं।

सभी जीव जंतु अपने रहने के लिए अनुकूलन आवास का प्रयोग करना चाहते हैं, परंतु किसी कारणवश कुछ जीव-जंतु अपने रहने योग्य अनुकूल परिस्थितियां नहीं पाते हैं। जिसके कारण वह अपने आप को उसी परिस्थिति के अनुसार ढाल लेते हैं और अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष करते हैं जिसमें अधिकांश सफल भी हुए हैं।


अनुकूलन किसे कहते हैं? इनके प्रकार | Adaptation in Hindi
बर्फीला क्षेत्र

सभी सजीवों अर्थात जीव जंतु में कुछ विशेष रचनाएं होती हैं जिनके कारण वह उपलब्ध होने वाले परिवेश में रहते हैं। पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जीव जंतु अपने रहने के लिए अलग-अलग परिवेश को अपनाकर उसमें रहने के लिए अनुकूलित हो गए हैं।

पौधों की तरह ही जीव जंतुओं को भी विभिन्न प्रकार के आवासों में रहने में कठिनाइयां आती हैं परंतु वह इन कठिनाइयों को अपनाकर विभिन्न प्रकार के आवासों में रहने के लिए अनुप्रीत हो गए हैं।


अनुकूलन के प्रकार (Types of Adaptions in Hindi) -:

1. जलीय अनुकूलन (Aquatic Adaptions)

2. मरुस्थलीय अनुकूलन (Desert Adaptions)

3. वृक्षीय अनुकूलन (Arboreal Adaptions)

4. स्थलीय अनुकूलन (Terrestrial Adaptions)

5. पर्वतीय क्षेत्र अनुकूलन (Mountain Regions Adaptions)


1. जलीय अनुकूलन (Aquatic Adaptions) -:

ऐसे जीव जो समुंद्र में रहने के लिए अनुकूलित हो गए हैं वह सभी जीव जलीय अनुकूलन के अंतर्गत आते हैं। मछलियां समुंद्री जीव है जो समुद्र में रहने के लिए अनुकूलित हो गई है।


2. मरुस्थलीय अनुकूलन (Desert Adaptions) -:

ऐसे जीव जो मरुस्थल में रहने के लिए अनुकूलित हो गए हैं, वह सभी जीव मरुस्थलीय अनुकूलन के अंतर्गत आते हैं। मरुस्थल में रहने वाले सभी जीव जंतुओं ने अपने आप को उसी के अनुसार अनुकूलित कर लिया है।

मरुस्थल में रहने वाले जीव बिना पानी के रहने, पानी का संरक्षण करने, ऊंचे तापमान में रहने और शत्रु से बचने के तरीकों को अपनाकर अपने आप को मरुस्थल के अनुकूलित कर लिया है। मरुस्थल में रहने वाले जीव जंतुओं को कृंतक के नाम से भी जाना जाता है।


मरुस्थलीय अनुकूलन से सम्बंधित कुछ लक्षण -

● मरुस्थल में रहने वाले जंतु सूखे बीज खाते हैं उन्हें पानी की आवश्यकता नहीं होती है।

● कुछ मरुस्थलीय जीव जमीन में गहरी सुरंग खोदकर रहते हैं जिससे वे सूर्य की सीधी रोशनी से बच सकें।

● मरुस्थल में रहने वाली छिपकली अपने लंबे और पतले पैरों का प्रयोग करते हुए अपने शरीर का संपर्क भूमि में नहीं होने देती हैं।

● मरुस्थल में रहने वाले जीव अपने शत्रुओं से बचाव के लिए सुरक्षात्मक रंगों और शरीर पर पाए जाने वाले कांटो का प्रयोग करते हैं।

● मरुस्थलीय जीव के देखने, सुनने और सुघने की शक्ति तीव्र होती है जिससे वे आसानी से दुश्मनों से अपना बचाव कर लेते हैं।

● मरुस्थलीय जीव अपने लंबे और गद्दीदार पैरों की सहायता से भोजन और पानी की तलाश दूर-दूर तक आसानी से घूमकर कर लेते हैं।


3. वृक्षीय अनुकूलन (Arboreal Adaptions) -:

ऐसे जीव जो वृक्षो पर रहने और चलने के लिए अनुकूलित हो गए हैं, वह सभी जीव मरुस्थलीय अनुकूलन के अंतर्गत आते हैं। वृक्षीय अनुकूलन के अंतर्गत आने वाले जीव पेड़ों पर ही रहते हैं, चलते हैं, शिकार करते हैं और अन्य क्रिया भी कर लेते हैं।

इस अनुकूलन के अंतर्गत जिला हरिद्वार चिपका लिया इत्यादि जीव जंतु आते हैं जो आसानी से वृक्षों पर चढ़ने और उतरने के लिए होते हैं।


वृक्षीय अनुकूलन से सम्बंधित कुछ लक्षण -

● वृक्षीय अनुकूलन में रहने वाले जीवो के शरीर मजबूत होते हैं और इनके पैरों की मजबूती भी शरीर को ऊपर चढ़ने और उतरने में सहायता प्रदान करती है।

● वृक्षीय अनुकूलन वाले जीव अपने विकसित पंजों से अपनी अच्छी पकड़ बना लेते हैं।

● वृक्ष पर चिपकने वाला मेढ़क के अंदर चिपकने वाली गद्दी पाई जाती हैं जिसकी सहायता से आसानी से चढ़ते और उतरते है।


4. स्थलीय अनुकूलन (Terrestrial Adaptions) -:

ऐसे जीव जो स्थल पर रहने और चलने के लिए अनुकूलित हो गए हैं, वह सभी जीव स्थलीय अनुकूलन के अंतर्गत आते हैं। इन जीवों के अंदर मनुष्य भी एक ऐसा जीव है जो स्थल पर निवास करता है।


5. पर्वतीय क्षेत्र अनुकूलन (Mountain Regions Adaptions) -:

पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले जीव जंतु भी पर्वत पर रहने के लिए अनुकूलित हो गए हैं। पर्वत पर रहने वाले जीव जंतुओं के शरीर पर मोटी चमड़ी वाली खाल होती है और उस पर अधिक मात्रा में बाल होते हैं।

इनके शरीर पर यह बाल, इन्हें गरम रखने का कार्य करते हैं जो उष्मा का आदान-प्रदान बाहर नहीं होने देते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों पर पाई जाने वाली बकरी के खुर मजबूत होते हैं बकरी के यह खूर उसे पहाड़ों पर चढ़ने और उतरने में बहुत ही सहायता करते हैं।

पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले तेंदुए के पैर व अंगुलियों सहित पूरे शरीर पर मोटे और रोयेदार बाल पाए जाते हैं जो उसे पर्वतीय क्षेत्रों और बर्फीले क्षेत्रों में गरम रखने का कार्य करते हैं।